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भगवान् विश्वनाथ की नगरी में
काशी धर्मसम्राट महाराज जी को अत्यन्त प्रिय थी। वे प्रायः चातुर्मास्य यहीं व्यतीत करते, काशी-माहात्म्य का शास्त्रीय विवेचन करते और भगवान् विश्वनाथ, केदारेश्वर तथा माँ गंगा की आराधना में स्थित रहते थे।
केदार घाट स्थित यह धाम उनकी काशी-निष्ठा का स्थायी साक्षी है। यह निष्ठा किसी संकीर्ण स्थान-बोध तक सीमित नहीं थी; अयोध्या, वृन्दावन, कुरुक्षेत्र, प्रयाग, उज्जैन और हरिद्वार के प्रति उनका भाव उसी व्यापक भारतीय तीर्थ-चेतना का विस्तार था।

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आराधना और देव-पञ्चायतन
केदार घाट के रामकूपेश्वर परिसर में महाराज जी ने शिव-पार्वती, गणेश, सूर्य, त्रिपुरसुन्दरी, श्रीराम-परिवार, श्रीराधा-कृष्ण, हनुमान जी और नन्दी सहित देव-पञ्चायतन की प्रतिष्ठा और सेवा की। उत्सव, झाँकी, पूजन और भोग-राग उनके लिए सतत आराधना के अंग थे।
यह आराधना उनके शास्त्र-दर्शन से पृथक नहीं थी। ज्ञान, भक्ति, मन्त्र, पूजा और मर्यादित आचार यहाँ एक ही आध्यात्मिक जीवन के विविध रूपों में प्रकट होते हैं।
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शास्त्र-अध्ययन की अविच्छिन्न परम्परा
चातुर्मास्य के समय महाराज जी यतियों, विद्वानों, ब्राह्मणों और विद्यार्थियों को प्रस्थानत्रयी, मीमांसा, न्याय, तन्त्र और वेद का अध्यापन करते थे। करपात्री धाम की आध्यात्मिक पहचान में अध्ययन और अध्यापन इसलिए मूल स्थान रखते हैं।
अगस्त 1979 में महाराज जी का काशी चातुर्मास्य-व्रतानुष्ठान केदार घाट स्थित वेदानुसन्धान संस्थान में सम्पन्न हुआ। उसी कालखण्ड के ग्रन्थ-विमोचन, संस्कृत वाङ्मय-प्रकाशन, रामकूपेश्वर महादेव एवं देव-पञ्चायतन की प्रतिष्ठा और विद्वत्-समारोहों में सहभागिता अध्ययन, आराधना और सार्वजनिक शास्त्र-सेवा के उनके संयुक्त स्वरूप को प्रकट करती है।

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महाप्रयाण और गंगा की गोद
7 फरवरी 1982 को गंगा-स्नान के पश्चात शिव-नाम का उच्चारण करते हुए धर्मसम्राट महाराज जी करपात्री धाम स्थित वेदानुसन्धान केन्द्र में ब्रह्मलीन हुए। 9 फरवरी को केदार घाट पर जगद्गुरु शंकराचार्य पुरी पीठाधीश्वर स्वामी निरंजन देव तीर्थ जी महाराज ने माँ गंगा की गोद में जल-समाधि की पावन सेवा सम्पन्न की।
इस कारण करपात्री धाम की भूमि जीवन, साधना और महाप्रयाण—तीनों की स्मृति को एक साथ धारण करती है। यहाँ स्मरण केवल अतीत का भाव नहीं, धर्ममय जीवन के प्रति वर्तमान उत्तरदायित्व है।
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संकलन, प्रकाशन और गुरु-स्मृति
श्री वेद शास्त्रानुसंधान केन्द्र, करपात्री धाम ने धर्मसम्राट महाराज जी के जीवन और धर्म-कार्य का प्रमाणित परिचय जिज्ञासुओं तक पहुँचाने को अपनी सेवा का अंग माना। सन् 2019 में प्रकाशित ‘श्री करपात्री स्वामी जीवनपथ’ इसी संस्थागत प्रयत्न का प्रत्यक्ष उदाहरण है; उसके आरम्भिक पृष्ठ पर धर्मसम्राट महाराज जी संस्थापक और परम पूज्य स्वामी श्री सर्वेश्वरानन्द सरस्वती जी महाराज अध्यक्ष के रूप में अंकित हैं।
इस लघु जीवनवृत्त का उद्देश्य केवल स्मरण नहीं, महाराज जी के धर्ममय, तपोमय और लोककल्याणार्थ समर्पित जीवन का उत्तरदायी परिचय हिन्दी तथा अंग्रेज़ी के जिज्ञासुओं तक पहुँचाना था। इसके संकलनकर्ता स्वामी सदानन्द सरस्वती वेदान्ती जी महाराज ने अपने नाम के साथ ‘करपात्री धाम, काशी’ अंकित कर गुरु-स्मृति और वाङ्मय-सेवा के इस सम्बन्ध को स्वयं स्पष्ट किया।
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वर्तमान आध्यात्मिक केन्द्र
परम पूज्य स्वामी श्री सर्वेश्वरानन्द सरस्वती जी महाराज करपात्री धाम के वर्तमान पीठाधीश्वर और अखिल भारतीय धर्म संघ के अध्यक्ष हैं। उनके मार्गदर्शन में गुरु-स्मृति, साधना, अनुष्ठान और संस्थागत सेवा की धारा वर्तमान में सतत प्रवाहित है।
काशी का प्रधान केन्द्र करपात्री धाम, बी-6/101, केदार घाट, वाराणसी, उत्तर प्रदेश 221001 पर स्थित है। धर्मसम्राट महाराज जी तथा परम्परा से जुड़ी पूज्य विभूतियों की स्मृति, देव-विग्रह-पूजन और धर्म-विमर्श के सार्वजनिक आयोजन इस धाम की वर्तमान भूमिका को प्रकट करते हैं।
दिल्ली, सिद्ध क्षेत्र नेमावर और देवकुण्ड सागर, बीकानेर अन्य तीन प्रमुख संस्थागत केन्द्र हैं। ये चार केन्द्र संस्थागत और आगमन-दिशा देते हैं—धर्मसम्राट महाराज जी की परम्परा और विश्वभर का श्रद्धालु-समुदाय इन स्थानों तक सीमित नहीं है।